बीरेंद्र सिंह की “दबंगई” उनके बेटे बृजेन्द्र के चुनाव के नतीजे पर भारी तो नहीं पड़ेगी

बृजेन्द्र की हार-जीत के जिम्मेदार उनके पिता बीरेंद्र !
हिसार लोकसभा चुनाव के सबसे हॉट सीट में 12 तारीख को पड़े वोट
अब पार्टी और प्रत्याशी के भविष्य का फैसला करेंगे और यह तय करेंगे की “जो जीता वही सिकंदर।”
बीरेंद्र सिंह के बारे में सभी जानते हैं कि वह कुछ भी कहने से कभी डरते नहीं
कई सभाओं में तो मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर को भी नसीहत देकर मामला मीडिया के सामने सुर्खियों में ला दिया था

हर पार्टी कहने लगी है उनकी जीत सुनिश्चित है। मगर पार्टी के कार्यकर्ताओं की अनुपस्थिती और पार्टी दफ्तर वीरान होने के नजारे इस बात को साबित कर रहे थे कि किस के दावों में कितना दम है। चुनाव में रातों-रात गेम बनते और बिगड़ते हैं। मगर हिसार में किसके गेम बने और किसके समीकरण बदले इस बात का अंदाजा शायद प्रत्याशियों को शाम तक हो चुका था। मगर ऐसा लगता है कि इस बार चुनाव में यह बात सामने आ जाएगी कि कौन है अपना और कौन है पराया।
सुना है कि एक पार्टी दूसरे पार्टी में अतिआत्मविश्वास में गड़बड़ करने के लिए खुद ही सामने वाली पार्टी की जीत के दावे करते जा रही थी। मगर इस चुनाव में भाजपा की सबसे कड़ी परीक्षा होने जा रही है। हिसार लोकसभा चुनाव में भाजपा की हार और जीत यह तय करेगी कि हरियाणा की राजनीती के सबसे पुराने खिलाड़ी बीरेंद्र सिंह की विरासत बचेगी या ताश के पत्तों की तरह बिखर जायेगी। क्योंकि जैसा की आपका पता है कि यह चुनाव विरासत का भी रहा है। इस चुनाव में बीरेंद्र सिंह के बेटे पूर्व आईएएस अफसर बृजेन्द्र सिंह के लिए चुनाव जीतना इसलिए भी जरुरी है कि एक तरफ उनको अपनी राजनीतिक विरासत को जिन्दा रखना है तो दूसरी तरफ यह भी साबित करना है कि उन्होंने सरकारी नौकरी छोड़कर कोई गलती नहीं की।
इस चुनाव में अगर भाजपा के प्रत्याशी बृजेन्द्र सिंह जीतते हैं तो वह साबित करने में कामयाब रहेंगे कि भाजपा की हरियाणा में इतनी मजबूत पकड़ और पार्टी हाईकमान का ऐसा आशीर्वाद है कि हिसार में मोदी लहर में सभी बह गए और अगर वह इस चुनाव को हारे तो इसका सबसे बड़ा कारण होगा उनके पिता का इन चुनावी मौसम में बर्ताव चाहे वह पत्रकारों से हो या कार्यकर्ताओं से। क्योंकि बीरेंद्र सिंह के स्वाभाव से काफी कार्यकर्ता नाराज हैं, मगर वह एक शिष्टाचार के कारण अपनी वेदना जाहिर कर नहीं रहे। इतना ही नहीं बीरेंद्र सिंह का घमंडी स्वाभाव भी मुख्य कारण होगा उनके बेटे की हार का। इतना ही नहीं बीरेंद्र सिंह के बारे में सभी जानते हैं कि वह कुछ भी कहने से कभी डरते नहीं। उन्होंने कई सभाओं में तो मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर को भी नसीहत देकर मामला मीडिया के सामने सुर्खियों में ला दिया था। यही कारण है कि यही उनका बर्ताव उनके बेटे को इस बार चुनाव में ले डूबेगा।

अगर बीरेंद्र सिंह को लगता है कि उनके बेटे बृजेन्द्र को उनके नाम पर और सर छोटूराम के नाम पर वोट मिलेगा तो यह उनकी बहुत बड़ी गलतफहमी होगी। क्योंकि जनता न तो उनके बारे में जिक्र करना न बोलना चाहती थी। इतना ही नहीं युवा वर्ग में बीरेंद्र सिंह की राजनीति से अनजान नजर आया। वैसे माना जा रहा है कि बीरेंद्र सिंह को लगता है कि वो सबसे वरिष्ठ और पुराने नेता हैं उनमें वो काबलियत है कि हारी बाजी को पलट दें, मगर भाजपा के कुछ कार्यकर्ताओं ने दबी जुबान में इस चुनाव के दौरान कहा कि उनका खुद पर घमंड इतना है इसलिए वह चाहते हैं कि उनका घमंड टूटे। अब यह घमंड कैसे टूटेगा मुझे पता नहीं, मगर 23 के नतीजे यह जरूर बताएंगे कि क्या नाराजगी का असर पड़ा या नहीं।